दिव्य ज्योति जाग्रती संस्थान गाँव टीकरी धर्मशाला में तीन दिवसीय हरि कथा का आयोजन

राजेश वर्मा। कुरुक्षेत्र भूमि

दिव्य ज्योति जाग्रती संस्थान गाँव टीकरी धर्मशाला में  तीन दिवसीय हरि कथा का आयोजन  किया जा रहा है जिसके प्रथम दिवस में गुरुदेव श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या सत्या भारती जी ने बताया समय-समय पर प्रभु इस धरती पर अवतार लेते हैं और पथ भ्रष्ट मानव जाति को भक्ति का मार्ग बताते हैं आगे उन्होंने बताया कि प्रभु की दिव्य लीलाओं का तत्समय प्रयोजन तो था ही आज वर्षोपरांत भी हमारे लिए एक प्रेरणा स्रोत हैं। जिसस े हमारे जीवन का मार्ग दर्शक हो सके। अतएव प्रभु के जीवन से जुडी यह लीलाएं हमारे लिए खास महत्त्व इसलिए भी रखती हैं क्योंकि उनसे हमारी संस्कृति और लोक व्यवहार जुड़ा हुआ है।
 सुश्री सत्या भारती जी ने बताया कि महापुरुषों की लीलाओं को दिव्य लीला क्यों कहते हैं क्योंकि उनकी लीलाएं अलौकिक होती हैं। जिसमें प्रत्येक मानव को कुछ सीखने को मिलता है व उनकी अलौकिक लीलाओं को हम अपनी लौकिक बुद्धि से कैसे समझ सकते हैं? बाह्य इन्द्रियों से तो मानव संसार को ही नहीं देख सकता। जिस प्रकार से सृष्टि में अनेको सूक्ष्म जीवाणु पाए जाते हैं तथा हमारी पृथ्वी से लाखों मील दूर आकाश में बहुत से ग्रह नक्षत्र पाए जाते हैं जिसे मानव अपनी प्राकृतिक आँखों के द्वारा नहीं देख सकता। उन्हें देखने के लिए भी मानव को सूक्ष्मदर्शी जैसे यंत्र की आवश्यकता पड़ती है। तो फिर ईश्वर जिसे हमारे शास्त्रों में अगोचर की संज्ञा से विभूषित किया उसे भला मानव इन भौतिक आँखों के द्वारा कैसे देख सकता है। उन्होने बताया कि प्रभु की ऐसी दिव्य लीलाओं को हम अपने घट में भी देख सकते हैं। लेकिन इसके लिए दिव्य चक्षु की आवश्यकता है। तभी हम अपने अंतः करण में व्याप्त प्रभु को देख सकते हैं। जिन भक्तों ने ईश्वर के दर्शन किये उनके पास बाहरी नहीं भीतरी आँख भी थी। भक्त सूरदास जी चक्षुहीन थे परन्तु उन्होंने प्रभु की लीलाओं का कैसे व्याख्यान किया। क्योंकि उन्होंने अपने घट में देखा था। हमारे सभी शास्त्र बतातें हैं कि हमें मानव तन ईश्वर का साक्षात्कार करने के लिए मिला है। इस मानव तन की तुलना नौका के समान की गई है। यदि हमने परमात्मा का दर्शन न किया, उसकी भजन बंदगी न की तो फिर हम भवसागर से पार कैसे हो पाएंगे? कथा को श्रवण करने हेतु उपस्थित भगवत प्रेमी इन आध्यात्मिक रहस्यों को श्रवण कर आश्चर्य से भर उठे।  साध्वी   अमबला भारती  व वनीता भारती जी ने भी मधुर भजनों का गायन कर भक्तों को भावविभोर कर दिया।

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