सहायता प्राप्त कॉलेजों के शिक्षक-कर्मचारी ‘न सरकारी, न आम नागरिक’ की स्थिति में

राजेश वर्मा। कुरुक्षेत्र भूमि
कुरुक्षेत्र,

उच्च शिक्षा की रीढ़ माने जाने वाले सहायता प्राप्त कॉलेजों के शिक्षक और कर्मचारी लंबे समय से प्रशासनिक उदासीनता और नीतिगत भेदभाव का शिकार हैं। न उन्हें पूर्ण सरकारी कर्मचारी का दर्जा प्राप्त है, न ही आम नागरिकों वाली बुनियादी सुविधाएं। वेतन देरी, ग्रेच्युटी से वंचित, चिकित्सा सुविधाओं का अभाव और महिला कर्मचारियों के अधिकारों की उपेक्षा अब उनके धैर्य की सीमा पार कर चुकी है।

कॉलेज टीचर्स एसोसिएशन (हरियाणा) के प्रधान डॉ. सुदीप कुमार ने साफ शब्दों में कहा, “हमारी नाराजगी किसी पार्टी या सरकार के विरुद्ध नहीं है। हमारी लड़ाई उस व्यवस्था के खिलाफ है जो हमारी समस्याओं के प्रति पूरी तरह संवेदनहीन हो चुकी है। हमने माननीय मुख्यमंत्री, शिक्षा मंत्री और उच्च अधिकारियों से बार-बार मुलाकात की, ज्ञापन सौंपे, लेकिन आज तक सिर्फ खोखले आश्वासन ही मिले हैं।”

वेतन देरी: परिवारों पर संकट
सबसे गंभीर समस्या मासिक वेतन की अनियमितता है। दो-तीन महीने की देरी अब सामान्य बात बन गई है। शिक्षक पूछते हैं – “जब सरकार हर महीने वेतन जारी करने का दावा करती है, तो आखिर यह देरी क्यों?” इस अनिश्चितता ने न केवल आर्थिक संकट पैदा कर दिया है, बल्कि शिक्षकों के मानसिक स्वास्थ्य को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। पढ़ाने वाला शिक्षक खुद चिंता और अवसाद के गर्त में फंस रहा है।

ग्रेच्युटी: अपमानजनक भेदभाव
निजी क्षेत्र के अकुशल कर्मचारी, दिहाड़ी मजदूर या सड़क सफाई कर्मी को भी ग्रेच्युटी का अधिकार प्राप्त है, लेकिन सहायता प्राप्त कॉलेजों के शिक्षक-कर्मचारी – जो समाज का भविष्य गढ़ते हैं – इस मूलभूत अधिकार से आज भी वंचित हैं। कर्मचारी इसे “स्पष्ट अन्याय और भेदभाव” मानते हैं।

महिला कर्मचारियों के साथ दोहरा मापदंड
महिला कर्मचारियों की स्थिति और भी चिंताजनक है। सरकार ने महिला सशक्तीकरण के तहत कैजुअल लीव (CL) की संख्या 20 से बढ़ाकर 25 करने का फैसला लिया था, लेकिन यह नीति सहायता प्राप्त कॉलेजों में लागू ही नहीं की जा रही। एक महिला कर्मचारी ने आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा, “सरकार जनहित का फैसला तो ले लेती है, लेकिन लागू करने वाली अफसरशाही उसे ठंडे बस्ते में डाल देती है। क्या हमारी पीड़ा कोई मायने नहीं रखती?”

चिकित्सा सुविधा: न यहां के, न वहां के
चिकित्सा व्यय की प्रतिपूर्ति में भी विरोधाभास साफ दिखता है। इन्हें न तो सरकारी कर्मचारियों वाली मेडिकल सुविधाएं मिलती हैं और न ही आम नागरिकों की तरह आयुष्मान भारत कार्ड। डॉ. सुदीप कुमार बताते हैं, “हमें हायर इनकम ग्रुप मानकर आयुष्मान कार्ड से बाहर रख दिया गया है। न सरकारी कर्मचारी, न आम जनता – हम अधर में लटकाए गए हैं। बीमारी हमारे लिए अभिशाप बन गई है।”

शिक्षक संघर्ष का उद्घोष
सहायता प्राप्त कॉलेज हरियाणा की उच्च शिक्षा प्रणाली की मजबूती का आधार हैं। इनकी उपेक्षा न केवल व्यक्तिगत स्तर पर अन्याय है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के लिए खतरा भी है। शिक्षक-कर्मचारी अब एकजुट होकर मांग कर रहे हैं कि:

- वेतन समय पर और नियमित रूप से जारी किया जाए
- ग्रेच्युटी का लाभ तुरंत दिया जाए
- महिला कर्मचारियों को बढ़ी हुई छुट्टियों का लाभ मिले
- उचित चिकित्सा सुविधाएं सुनिश्चित की जाएं
- संरचनात्मक भेदभाव को समाप्त कर पूर्ण सेवा शर्तें लागू की जाएं

डॉ. सुदीप कुमार और उनके सहयोगी स्पष्ट संदेश देते हैं – “यह संघर्ष शिक्षा सिपाहियों का है। हम सिर्फ अपना हक मांग रहे हैं, जो हमें वर्षों से रोका जा रहा है।”

अब सवाल यह है कि सरकार और प्रशासन कब तक इस “अधकचरी स्थिति” को जारी रखेगा और कब इन समर्पित शिक्षकों-कर्मचारियों को उनका बकाया हक और सम्मान वापस लौटाएगा।
प्रधान 
डॉ सुदीप कुमार 
कॉलेज टीचर्स एसोसिएशन (सरकारी सहायता प्राप्त कॉलेज, हरियाणा)

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