स्काईरूट के विक्रम-1 ने पहली ही उड़ान में रचा इतिहास; कक्षा में पहुंचा भारत का पहला निजी रॉकेट

  स्काईरूट पहले ही प्रक्षेपण में शानदार सफलता के साथ, भारत की पहली निजी कंपनी बन गई है जिसने देश में डिज़ाइन, निर्मित और विकसित किए गए रॉकेट को कक्षा (ऑर्बिट) में सफलतापूर्वक पहुंचाया। इस मिशन के तहत कंपनी ने अपने स्कोप उपग्रह, ग्रहा स्पेस के सोलारस उपग्रह तथा कक्षा में किए जाने वाले अन्य प्रयोगों को भी सफलतापूर्वक स्थापित किया। इसके साथ ही, स्काईरूट ने दुनिया के लिए अंतरिक्ष तक पहुंच का नया द्वार खोल दिया है।


 
अभिषेक पूर्णिमा/राजेश वर्मा 

चंडीगढ़/दिल्ली। स्काईरूट एयरोस्पेस आज इतिहास रचते हुए, अपनी पहली ही कोशिश में भारतीय

रॉकेट को ऑर्बिट तक पहुंचाने वाली पहली निजी कंपनी बन गई। मिशन आगमन सतीश धवन स्पेस सेंटर, श्रीहरिकोटा के पहले लॉन्च पैड से रवाना हुआ। विक्रम-1 ने तय प्रक्षेप-पथ पर उड़ान भरी और लगभग 450 किमी की ऊंचाई और 60-डिग्री झुकाव वाले अपने लक्ष्य 'लो अर्थ ऑर्बिट; (एलईओ) तक पहुंचा, जहां उसने सफलतापूर्वक अपने पेलोड तैनात किए। स्काईरूट, इस तरह उन चुनिंदा कंपनियों के समूह में शामिल हो गई, जो ऑर्बिट तक पहुंचने में सक्षम हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विक्रम-1 की सफलता पर स्काईरूट टीम को व्यक्तिगत रूप से बधाई दी। उन्होंने हाथ से लिखा पोस्टकार्ड भी विक्रम-1 के साथ अंतरिक्ष भेजा, जिस पर वंदे मातरम्  अंकित है। इसरो के अध्यक्ष, डॉ. वी. नारायणन ने कहा, मैं विक्रम-1 मिशन की सफलता पर स्काईरूट की टीम को

हार्दिक बधाई देता हूं। यह उपलब्धि वर्षों के नवोन्मेष, दृढ़ता और इंजीनियरिंग के लिहाज़ से बेहतरीन प्रयास का परिणाम है, और इससे भारत के निजी अंतरिक्ष क्षेत्र की बढ़ती परिपक्वता रेखांकित होती है। यह देखना उत्साहजनक है कि भारतीय उद्योग अपनी प्रौद्योगिकी क्षमता को लॉन्च क्षमता में तब्दील कर रहा है, जो हमारे राष्ट्रीय अंतरिक्ष कार्यक्रम को और मज़बूती प्रदान करेगा। इसरो और इन-स्पेस उद्योग के सहयोगियों के साथ मिलकर जीवंत और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी अंतरिक्ष परितंत्र तैयार करने के लिए प्रतिबद्ध है, जिससे भारत की अंतरिक्ष से जुड़ी महत्वाकांक्षा का विस्तार होगा। इन-स्पेस के अध्यक्ष डॉ. पवन गोयनका ने कहा "यह न केवल स्काईरूट के लिए बल्कि पूरे देश के लिए गर्व का दिन है। दुनिया के बहुत कम देश अपने बलबूते अंतरिक्ष तक पहुंच पाए हैं, और आज भारत की एक निजी कंपनी उस विशिष्ट खेमे में शामिल हो गई। आज जो रॉकेट लॉन्च हुआ, वह वर्षों की मेहनत, एक हज़ार से अधिक लोगों की टीम और लगभग चार सौ आपूर्तिकर्ताओं के प्रयासों का नतीज़ा है। स्काईरूट टीम को बधाई। आपने हमें एक यादगार ‘भारतीय पल’ (इंडिया मोमेंट) का अहसास करने का अवसर प्रदान किया। स्काईरूट के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी, पवन कुमार चंदना ने कहा, आज यहां उपस्थित होकर हमें बहुत गर्व हो रहा है। विक्रम-1 अपनी तय ऑर्बिट तक पहुंचा और उसने हमारे अपने स्कोप सैटेलाइट, ग्रहा स्पेस के सोलारस उपग्रह और ऑर्बिट में किए जाने वाले अन्य प्रयोगों को तैनात किया। इस उपलब्धि के साथ, स्काईरूट अपनी पहली ही उड़ान में रॉकेट को ऑर्बिट तक पहुंचाने वाली पहली निजी कंपनी बन गई है।आज दुनिया ने जो देखा, वह हमारी टीम और देश भर में फैले हमारे भागीदारों और आपूर्तिकर्ताओं कीसालों की मेहनत का परिणाम है। इससे साबित होता है कि भारत के पास ऐसे लॉन्च व्हीकल बनाने की प्रतिभा, टेक्नोलॉजी और औद्योगिक क्षमता है जो दुनिया के मानकों पर खरे उतरते हैं और दुनिया भर को उत्कृष्ट सेवा प्रदान कर सकते हैं। हमेशा से हमारा लक्ष्य सबके लिए अंतरिक्ष के दरवाज़े खोलना रहा है। आज हमने उस दरवाज़े को थोड़ा और बड़ा कर दिया है। यह मंज़िल नहीं है। यह तो बस शुरुआत है। यहां से हम आगे की बड़ी छलांगलगाएंगे।उड़ान के दौरान, विक्रम-1 ने मिशन के हर मुख्य पड़ाव को पूरा किया और असली ऑपरेशनल स्थितियों में अपने प्रोपल्शन, एवियोनिक्स और गाइडेंस, नेविगेशन और कंट्रोल सिस्टम के प्रदर्शन की क्षमता को साबित किया। व्हीकल ने ग्राहक के पेलोड को तैनात किया और उड़ान के दौरान बहुत सारा डेटा इकट्ठा किया, जो भविष्य के विक्रम मिशनों और स्काईरूट के लॉन्च प्रोग्राम के लगातार विकास में सीधे तौर पर काम आएगा।स्काईरूट एयरोस्पेस के सह-संस्थापक और मुख्य परिचालन अधिकारी ने कहा, मिशन आगमन सालों की इंजीनियरिंग, कड़े परीक्षण और अंतरिक्ष से जुड़ी कुछ सबसे मुश्किल समस्याओं को हल करने के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता का परिणाम है। आज का हर पड़ाव उन सैकड़ों इंजीनियरों, तकनीशियनों और मिशन विशेषज्ञों के समर्पण को दिखाता है, जो सीमा से परे जाने के प्रति दृढ़ रहे। हम इसरो, इन-स्पेस और उन सभी ग्राहकों, निवेशकों और भागीदारों के बहुत आभारी हैं जिन्होंने हमें पूर्ण समर्थन प्रदान किया। जश्न मनाने के साथ-साथ हम आज की सीख को विक्रम श्रृंखला के अगले चरण में और भारत से दुनिया के लिए विश्व-स्तरीय लॉन्च क्षमता के निर्माण में लागू करेंगे। विक्रम-1 सात मंज़िला ऊंचा, मल्टी-स्टेज ऑर्बिटल लॉन्च व्हीकल है। यह पूरी तरह से कार्बन-कम्पोजिट ढांचे से बना है और इसमें कंपनी द्वारा खुद विकसित प्रोपल्शन सिस्टम (जिसमें 3डी-प्रिंटेड इंजन और हाई- थ्रस्ट सॉलिड-फ्यूल मोटर शामिल हैं) का इस्तेमाल किया गया है। इसे 350 किलोग्राम तक के छोटे उपग्रहों को लो अर्थ ऑर्बिट (एलईओ) तक पहुंचाने के लिए तैयार किया गया है। इसके अल्ट्रा-लो-शॉक, ज़मीन पर परीक्षण किए जा सकने वाले सेपरेशन सिस्टम को इसमें ले जाए जाने वाले नाज़ुक उपग्रहों की सुरक्षा के लिए बनाया गया है। इस उड़ान में, विक्रम-1 स्काईरूट के अपने स्कोप उपग्रह के साथ-साथ ग्रहा स्पेस, कॉस्मोसर्व और डीक्यूब्ड का टेक्नोलॉजी-डेमोंस्ट्रेशन पेलोड ले गया। इसके अलावा, इसमें कॉस्मॉस डायमंड्स की कलाकृति ‘कॉस्मिक ब्लूम’ और एक सूक्ष्म कलाकृति भी शामिल थी, जो इस बात की याद दिलाता है कि अंतरिक्ष तक पहुंचकेवल टेक्नोलॉजी ही नहीं, बल्कि मानवीय अभिव्यक्ति और रचनात्मकता को भी अपने साथ ले जा सकती है। विक्रम-1 की सफलता, स्काईरूट के वाणिज्यिक लॉन्च कार्यक्रम की बुनियाद है और वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था में भारत के बड़ी शक्ति के तौर पर उभरने की प्रक्रिया को मज़बूती प्रदान करती है। कंपनी के खाके में विक्रम-2 शामिल है, जो लो अर्थ ऑर्बिट (एलईओ) तक 1,000 किलोग्राम तक का पेलोड ले जाने में सक्षम है और जिसकी पहली उड़ान 2027 के लिए तय की गई है। इसके अलावा, पूरी तरह से दोबारा इस्तेमाल होने वाला लॉन्च व्हीकल भी योजना का हिस्सा है, जिसके बूस्टर और अपर स्टेज दोनों को रिकवरी और दोबारा इस्तेमाल के लिए बनाया गया है, ताकि ऑर्बिट तक पहुंचने की लागत को और कम किया जा सके।स्काईरूट का लक्ष्य है, सभी के लिए अंतरिक्ष के दरवाज़े खोलना। आज, भारत की धरती से उस लक्ष्य ने उड़ान भरी और इसके साथ ही, अंतरिक्ष तक पहुंच के लिहाज़ से दुनिया के नक्शे पर एक नया मुकाम स्थापित हुआ।

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