पृथूदक तीर्थ पिहोवा में चैत्र चौदस मेला 17 से, पितरों के पिंडदान और सरस्वती स्नान का विशेष महत्व

>>पिहोवा में 17 से 19 मार्च तक लगेगा प्रसिद्ध पिशाच मोचनी चैत्र चौदस मेला


राजेश वर्मा। कुरुक्षेत्र भूमि

पिहोवा (कुरुक्षेत्र)। 



चैत्र मास में लगने वाला पिशाच मोचनी चैत्र चौदस का मेला उत्तर भारत के प्रसिद्ध धार्मिक मेलों में से एक माना जाता है। इस वर्ष यह पवित्र मेला 17 मार्च 2026 से 19 मार्च 2026 तक आयोजित किया जाएगा। पहले यह मेला पांच दिनों तक चलता था, लेकिन अब सरकारी स्तर पर इसे तीन दिनों तक आयोजित किया जाता है।


इस मेले में हिमाचल प्रदेश, पंजाब और हरियाणा सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु बड़ी संख्या में पिहोवा पहुंचते हैं। श्रद्धालु यहां सरस्वती नदी के पवित्र तट पर स्नान करते हैं और अपने पितरों की शांति के लिए पिंडदान करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस तीर्थ में स्नान और पिंडदान करने से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।


पुराणों में पिहोवा के पृथूदक तीर्थ का विशेष महत्व बताया गया है। स्कंद पुराण और वामन पुराण में वर्णन मिलता है कि चैत्र कृष्ण त्रयोदशी के पावन अवसर पर सरस्वती तट पर स्नान करने से सैकड़ों सूर्यग्रहण के समान पुण्य फल प्राप्त होता है।


पिहोवा का पृथूदक तीर्थ अत्यंत पवित्र माना जाता है और इसे कुरुक्षेत्र से भी अधिक पवित्र सरस्वती तीर्थ कहा गया है। मान्यता है कि गंगा, यमुना, नर्मदा और सिंधु नदियों में स्नान का जो फल मिलता है, वह अकेले पिहोवा में स्नान करने से प्राप्त हो जाता है।


पौराणिक कथाओं के अनुसार इसी तीर्थ पर राजा गाधि के पुत्र विश्वामित्र ने तप कर क्षत्रिय से ब्राह्मण का दर्जा प्राप्त किया था। यही वह स्थान है जहां राजा ययाति ने सौ यज्ञ किए थे तथा कई महान ऋषियों ने तपस्या कर सिद्धि प्राप्त की थी।


इस पवित्र तीर्थ का नाम राजा पृथु के नाम पर पड़ा। कहा जाता है कि राजा पृथु ने अपने पिता के निधन के बाद सरस्वती तट पर उनका अंतिम संस्कार और पिंडदान किया था। तभी से इस स्थान को पृथूदक तीर्थ या पिहोवा कहा जाने लगा।


महाभारत और वामन पुराण के अनुसार यहां स्नान और पिंडदान करने से अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है और मनुष्य को स्वर्ग लोक की प्राप्ति होती है। सरस्वती सरोवर पिहोवा का मुख्य तीर्थ स्थल है, जहां श्रद्धालु स्नान कर अपने पितरों के निमित्त पिंडदान करते हैं।


इसी कारण वर्ष भर देशभर से लोग अपने पितरों की सद्गति के लिए पिहोवा के इस पवित्र तीर्थ पर पहुंचते हैं और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

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