पिहोवा, 22 जून। संगमेश्वर महादेव मंदिर अरुणाय में सोमवार सुबह अद्भुत नजारा देखने को मिला। मंदिर में स्थित शिवलिंग पर अचानक एक नाग आकर लिपट गया। बाद में भीड़ बढ़ती देख नाग वहां से निकलकर पीछे खेतों की ओर चला गया। ये पूरा नजारा मंदिर के सेवादारों और श्रद्धालुओं ने अपने मोबाइल में कैद किया। सेवादल से प्रबंधक भूषण गौतम ने बताया कि रात को भगवान शिव को वस्त्र ओढ़ाकर प्रतिदिन विश्राम दिया जाता है। सुबह आरती करने के बाद मंदिर के कपाट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए जाते हैं। सोमवार सुबह जब पुजारी और सेवादार लगभग साढ़े 3 बजे गर्भ ग्रह के कपाट खोलने पहुंचे तो भगवान को ओढ़ाए गए कंबल में हलचल दिखी। पास गए तो नीचे से फुंकारने की आवाज आई। इसके बाद सेवादारों ने सावधानी से पाइप से कंबल हटाया तो देखा की शिवलिंग से एक काले रंग का सांप फन फैलाए लिपटा हुआ है। जो तेजी से फुंकार रहा है। सेवादारों ने सुरक्षा को देखते हुए तुरंत बाहर से गेट बंद कर दिया ताकि सुबह जल्दी आने वाला कोई श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश ना कर जाए। इसके बाद मंदिर प्रशासन को सूचना दी गई तो सेवादल प्रबंधक भूषण गौतम मौके पर पहुंचे। कुछ देर बाद नाग सीढ़ियों घिसटते हुए बाहर निकल गया और खेतों की तरफ चला गया। इसके बाद श्रद्धालुओं के लिए मंदिर के कपाट खोले गए। जैसे ही लोगों को नाग के आने की सूचना मिली तो भारी भीड़ मंदिर में उमड़ गई।
हर साल आते हैं नाग
मंदिर सेवादल के प्रबंधक भूषण गौतम ने बताया कि नाग अक्सर शिवलिंग पर आते रहते हैं। लेकिन इनके आने को कोई दिन या समय निश्चित नहीं है। इतने सालों में एक बार भी ऐसा नहीं हुआ कि नाग ने किसी श्रद्धालु को नुक्सान पहुंचाने की कोशिश की हो।
स्वंय प्रकट हुए थे यहां भगवान शिव
मंदिर की इतिहास पुस्तिका के मुताबिक यहां भगवान शिव स्वंय लिंग रूप में प्रकट हुए थे, जो स्वंय भू लिंग के रूप में मुख्य मंदिर में आज भी विराजमान हैं। यहां पुराने समय में महात्मा गणेश गिरि अपने शिष्यों सहित रहते थे। एक दिन वह झाडिय़ों की तरफ घूम रहे थे। वहां उन्हें घास के बीच एक दीमक का ढेर दिखाई दिया। जब उन्होंने अपने चिमटे से इस ढ़ेर को कुरेद कर देखा तो उनकी चिमटा किसी ठोस चीज से टकराया। जब उन्होंने दीमक को हटा कर देखा तो उन्हें यहां बड़ा सुंदर और तेजस्वी शिवलिंग दिखाई दिया। उन्होंने सोचा कि क्यों न इस शिवलिंग को यहां से उखाड़कर किसी साफ स्थान पर स्थापित कर दिया जाए। उन्हें खुदाई करते करते सांय हो गई। लेकिन शिवलिंग का अंतिम छोर नहीं मिला। थककर वे रात को सो गए। रात को उनके स्वप्न में भगवान शिव आए और उन्हें प्रेरणा दी कि वे इस शिवलिंग को यहां से हटने का प्रयास न करें। बल्कि इसी स्थान पर मंदिर का निर्माण करें। सुबह जब वे उसी स्थान पर पहुंचे तो देखा कि एक बड़ा काला सर्प शिवलिंग से लिपटा हुआ है। तब उन्होंने भगवान शिव से क्षमा मांगी और यहां मंदिर बनवाने का संकल्प लिया। 1942 से कुछ समय पूर्व यहां के तत्कालीन सचिव महंत गिरधर नारायाण गिरि ने यहां की दशा सुधारने का बीड़ा उठाया। भगवान शिव की कृपा से तत्कालीन सचिव की मांग पर संस्था ने यहां मंदिर बनाने के प्रस्ताव को स्वीकृति दे दी। 1946 ई. में यहां महंत गिरधर नारायण पुरी व बाबा शरण पुरी के प्रयास से एक लाख की लागत से मंदिर व डेरे का निमार्ण पूरा हुआ।
यहां रक्त प्रवाह से मुक्त हुई थी सरस्वती
यह तीर्थ अरुणा व सरस्वती के संगम पर स्थित है। पुराणों के अनुसार महर्षि वशिष्ठ और विश्वामित्र ऋषि में एक दूसरे से अधिक तपोबल हासिल करने की होड़ लगी हुई थी। तब विश्वामित्र ने सरस्वती को छल से महर्षि वशिष्ठ को अपने आश्रम तक लाने की बात कही, ताकि वे महर्षि वशिष्ठ को समाप्त कर सकें। श्राप के डर से सरस्वती तेज बहाव के साथ सरस्वती महर्षि वशिष्ठ को विश्वामित्र आश्रम के द्वार तक ले आई। लेकिन जब विश्वामित्र महर्षि वशिष्ठ की ओर बढऩे लगे तो सरस्वती महर्षि वशिष्ठ को पूर्व की ओर बहा कर ले गई। इससे विश्वामित्र क्रोधित हो गए और सरस्वती को खून से भरकर बहने का श्राप दे दिया। खून का बहाव शुरू होने पर सरस्वती के किनारे राक्षसों ने डेरा डाल लिया। महर्षि वशिष्ठ ने सरस्वती को यहां प्रकट हुए शिवलिंग की अराधना करने को कहा। सरस्वती ने इसी तीर्थ पर शिव की अराधना की तो भगवान शिव ने उसे विश्वामित्र के श्राप से मुक्त करके फिर से जलधारा से भर दिया।
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